Editor’s Choice

अब जिन्दगी ढलान पर है
न जाने, इस जीवन की शाम
कब हो जाय, कुछ पता नहीं
एक दिन जाना तो सभी को है
पर कौन कब चल दे, क्या जाने
कल का ठिकाना क्या, पता नहीं
तो चलो क्यों न एक बार
संवाद कायम कर लें फिर से
हम मित्र बन जाएं पहले जैसे…
पहले जैसी ही परवाह करें
एक-दूसरे की, सुख-दुख की
देखें तो बस रास्ते ही तो अलग थे
दूरी भी तो बस दो शरीरों की रही
फिर भी हम कितने नजदीक थे
हमारी आत्मा से, हमारे मन से
तो चलो क्यों एक बार
संवाद कायम कर लें फिर से
हम मित्र बन जाएं पहले जैसे…
न जाने क्या हुआ एक दिन
अनचाही दीवार खड़ी हो गई
बीच हमारी आत्मा और मन के
शायद तुमने समझा दोस्ती नहीं रही
पर मैं तो अब भी वहीं खड़ा हूँ
उसी दोराहे पर निर्निमेष निश्चल
जहाँ से हमारे रास्ते अलग हुए थे
तो चलो क्यों न एक बार
संवाद कायम कर लें फिर से
हम मित्र बन जाएं पहले जैसे…
अब तो किसी अप्रिय प्रतिगमन
या पुनरावृत्ति की भी आशंका नहीं
चाहे अलग-अलग ही सही
पर जीवन तो हम जी ही चुके
अपने हिस्से के सुख और दुख
और सांसारिक लालसा बाकी नहीं
तो चलो क्यों न एक बार
संवाद कायम कर लें फिर से
हम मित्र बन जाएं पहले जैसे.

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