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Sonnet

14 lines poetry

  1. Poem
​भोर हुई, मन दर्पण मानिंद निर्मल और शांत जगा,रात्रि की पूरी निद्रा से, हर कोना हर्षित व नया लगा;पर इस पावन सन्नाटे में, एकाएक ऐसी टीस उठी,एक तीखी कूक से, मानो जैसे अंतर्मन की शांति लुटी। ​देखा एक पपीहा अपनी विरह-वेदना फिर दोहराता है,जैसे एक सुलगता, अनसुलझा गीत नभ में बिखराता है;“पी कहाँ… पी कहाँ…” […]

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प्रतिवर्ष दशानन दहन किया, मन के रावण का नाश नहीं,अगनित सीता अपहृत होती, निज मर्यादा का भास नहीं।हम एक जलाते दशकंधर, शत दशकंधर पैदा होते,करते जो दहन मन का रावण, हर गली में रावण न होते। इस शक्ति पर्व का हेतु है क्या, है ब्यर्थ दिखावे की शक्ती,निर्बल को संबल दे न सके, अन्याय से […]

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