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Poem

  1. Poem
सत्य की ईंटों से, उसने भव्य मंदिर था रचा,छल-कपट के वेग से, जो सर्वदा रक्षित बचा;लोग जिसकी निष्ठा को नमन करते हर घड़ी,पर स्वयं के ही भाग्य से, प्रबल जंग है छिड़ी। बंधा रहा जो व्यक्ति सदा सत्य की मर्यादा से,अपराधी सिद्ध हुआ, एक प्रियजन के दुराव से;तमाम नतमस्तक हैं, जिसके अडिग चरित्र पर,हारा वह […]
  1. Poem
​न मुझे कोई आभास है, अब कोई सरोकार भी नहीं,ये शब्द तुम तक पहुँचें या खो जाएँ हवाओं में कहीं;सत्य एक शिलाखंड है – एकाकी, खुरदरा और निर्भ्रांत,जिस दिन तुम्हें खोया, मेरी दुनिया पर छा गई थी रात। लोग मुझे अक्सर कहते हैं, कि पाषाण सा अडिग हूँ मैंकिसे ज्ञात है, अपनी ही पीड़ा की […]

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​न मुझे कोई आभास है, अब कोई सरोकार भी नहीं,ये शब्द तुम तक पहुँचें या खो जाएँ हवाओं में कहीं;सत्य एक शिलाखंड है – एकाकी, खुरदरा और निर्भ्रांत,जिस दिन तुम्हें खोया, मेरी दुनिया पर छा गई थी रात। लोग मुझे अक्सर कहते हैं, कि पाषाण सा अडिग हूँ मैंकिसे ज्ञात है, अपनी ही पीड़ा की […]

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प्रतिवर्ष दशानन दहन किया, मन के रावण का नाश नहीं,अगनित सीता अपहृत होती, निज मर्यादा का भास नहीं।हम एक जलाते दशकंधर, शत दशकंधर पैदा होते,करते जो दहन मन का रावण, हर गली में रावण न होते। इस शक्ति पर्व का हेतु है क्या, है ब्यर्थ दिखावे की शक्ती,निर्बल को संबल दे न सके, अन्याय से […]

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