My Humming Word

Poem

  1. Poem
Alas!This attribute is uniqueAnd special to human speciesIn vast expanse of cosmic horizon… On one handThey have invented religionAnd discovered the attributesOf God, for worship and devotion… Yet on other handThey exploit and ruin natureTotally unaware of the candourThat’s the marvel of God’s creation. An inexcusable height of Ignorance!  28,687 total views,  26 views today
  1. Poem
चलो ‘युधिष्ठिर’ जीत गये तुम अब नवीन कुछ काम करोपराजितों को गले लगाकर उनका भी सम्मान करो ‘प्रसाद’ के साथ मिलकर तुम नए युग की शुरुआत करो ‘आभा’ और ‘अभिषेक’ सुनो अब तुम्हारी ये जिम्मेदारी है बड़े-बुजुर्गों का मान बढ़ाओ क्योंकि सोच तुम्हारी प्यारी है दोनों ‘शर्मा बन्धु’ मिलकरअब बिन शर्माये काम करो बनी रहे ये युगल जोड़ी ऐसा कुछ व्यवहार करो ‘महेंद्र’, तुम बन गए खजांची कॉलोनी […]
  1. Poem
Editor’s Choice सहयोग परस्पर हो सबका सब को त्योहार मनाने दें।हर आँगन को आलोकित कर सबको उल्लास मनाने दें। इस तरह मनाएं दीप पर्व, अंतर का तम सब मिट जाये।अज्ञान मिटे अर्न्तमन का, जीवन का घन तम हट जाये।मावस की काली रजनी ज्यों, है तिमिर मोह का अभ्यंतर-सबको इस पावन दीप पर्व पर वैदिक यज्ञ […]
  1. Poem
दर्द संजोये रखना दिल में अधरों से कुछ मत कहना।हँस-हँस कर कितना कोई पूँछे सीने में भींचे रहना।कहने से हासिल क्या होगा इठलायेंगे सभी मगर-बांट न लेगा लेशमात्र कोई खुद को ही सब है सहना। रखना सदा छुपाए इसको अपनी पलकों के अंदर।चारों ओर हो तिमिर घनेेरा बिछे हुए कांटे पथ पर।घोर उदासी के बादल […]
  1. Poem
पावस की मधुरिम रातों में, प्रिय याद तुम्हारी आयी है,संस्मरण पुराने जो बिस्मृत, सब संग वो अपने लायी है।वो मधुर घड़ी, संबन्ध नये, मन वीणा की झंकार नवल,दो अनजानों का मधुर मिलन, एकात्म आत्मा का पावन। क्या भूलूॅं और क्या याद करूॅं, हर पृष्ठ अलौकिक है लगता,रातें लगतीं मधुचन्द्र सरिस, मधुमास सरिस हर दिन लगता।काया […]

Good Reads

​भोर हुई, मन दर्पण मानिंद निर्मल और शांत जगा,रात्रि की पूरी निद्रा से, हर कोना हर्षित व नया लगा;पर इस पावन सन्नाटे में, एकाएक ऐसी टीस उठी,एक तीखी कूक से, मानो जैसे अंतर्मन की शांति लुटी। ​देखा एक पपीहा अपनी विरह-वेदना फिर दोहराता है,जैसे एक सुलगता, अनसुलझा गीत नभ में बिखराता है;“पी कहाँ… पी कहाँ…” […]

Worlwide

​भोर हुई, मन दर्पण मानिंद निर्मल और शांत जगा,रात्रि की पूरी निद्रा से, हर कोना हर्षित व नया लगा;पर इस पावन सन्नाटे में, एकाएक ऐसी टीस उठी,एक तीखी कूक से, मानो जैसे अंतर्मन की शांति लुटी। ​देखा एक पपीहा अपनी विरह-वेदना फिर दोहराता है,जैसे एक सुलगता, अनसुलझा गीत नभ में बिखराता है;“पी कहाँ… पी कहाँ…” […]

Trending

सूख चुके हैं प्रेमपात्र सब, मदिरा की गागर दे दो भूल चुका हूँ कौन कौन है, विस्मृति का आश्रय दे दो. ईश्वर सबकुछ भूल गया है, कृष्ण नही अब रथ पर हैंसत्य-प्रेम की राहों पर हम, फिर भी काँटे पथ पर हैं. जीवन बंधा-बंधा सा क्यों है, हाहाकार मचा यह क्यों है मानव संबंधों के तलतम  में, यह भूकंपी […]
लाख समझाने पर भी नहीं समझता आईना मेरा अंदर की टूटती नसें भी उकेर दीं बनाकर उसने दरकती लकीरें वो जो बैठे हैं गहरे दिल में मेरे आईना मेरा उन्हें भी हूबहू दिखाता है. कैसे छिपाऊँ दर्दे-दिल को सामने जब बैरी-मितवा हो ऐसा चुप हूँ मैं, चुप हैं वो, मंजर है खामोशी का यह कैसा. दिल की जिद है रग-रग में […]
समय चुप है अपनी निष्ठुरता लिए बदल रहा है निरंतर. तुम समय हो मेरे समय जिसने प्यार दिया अनंत डुबोकर किया एकाकार खुशियों से अमृत सुख की स्मृतियों से साँस साँस में चलती अनवरत सामीप्य की अव्यक्त अनुभूतियों से.     समय मेरा दूर असंबद्ध सा अबदर्शक सा बन बदल रहा है     सहारे तन के मन के     तुझसे जो बंधे थे अडिग अटूट  […]

Login

You cannot copy content of this page