जगत् सराहे निस्सारों को, जिनका जीवन शोर बना,
अहंकार की सीढ़ी चढ़कर, बस झूठा गौरव गान बना;
क्षण-भंगुर जयकारों की जिन्हें जीवन भर प्यास रहे,
रिक्त, व्याकुल उन आत्माओं के भाव सदा अतृप्त रहे।
उनको मिथ्या यश की ख़ातिर व्यर्थ तड़पते पाता हूँ,
देख तमाशा इस दुनिया का, मन ही मन मुस्काता हूँ;
पीठ फेर उस अंधी दौड़ से, दूर स्वयं मैं हो जाता हूँ,
सुख-शान्ति के नीरव वन में खुद का आश्रय पाता हूँ।
अब न नाम की चाह शेष है, न यश का आकर्षण है,
धन भी क्या है, यह आत्मा पर केवल भारी बन्धन है;
मान-सम्मान की चाह नहीं, न छल का कोई खेल रचूँ,
आलोकित हो मार्ग जहाँ, बस मोह-जाल से सदा बचूँ।
मैं तो अब बस कर्म करूँ, न गौरव से अभिमान करूँ,
निन्दा आए, यश भी आए – दोनों पर समभाव धरूँ;
सुख-दुःख की लहरों से, यह मन कभी न विचलित हो,
यही अक्षय सम्पदा हमारी, जीवन विभु को अर्पित हो।
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