
कीचड़ की कैद में थी झील की सोई हुई दृष्टि,
अब नीलम-दर्पण बनकर जल ने पाई नव सृष्टि।
कुमुदिनियों की अरुण हँसी बिखरी है लहरों पर,
मानो उषा ने लिख दी हो कविता जल के अंतर।
जहाँ जकड़े थे स्वप्न कभी दलदल की बेड़ियों में,
वहीं आज जीवन गाता है हरीतिम छेड़ियों में।
धुंधलाते क्षितिज से मुक्त हुआ अब यह जल-मन,
मानो धरती ने ओढ़ा’ है नव-वसंत का हरित वसन।
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