
एक अजीबो गरीब अंदाज में दिखता है वह इंसान,
बेचैन हाथ और डिजिटल परेड उसकी पहचान।
बेढब भड़कीले रंगों में चीखते प्रायः उसके परिधान,
जैसे शोर मचाते रंग ही बढ़ा देंगे उसकी शान।
चमकदार स्क्रीन से होती है हर सुबह की शुरुआत,
फिर वही झिलमिलाती रोशनी चलती रहती है देर रात।
उसकी हर छोटी सोच, हर परोसी हुई थाली की कशिश,
जनता की वाहवाही और ध्यान पाने की कोशिश।
व्यवस्था और सरकार का वो है कड़ा आलोचक,
संतुलन से गुणहीन, भारीपन से है बेखबर ये सोचक।
राष्ट्र का मज़ाक उड़ाता, पर्वत पर कटाक्ष करता,
अखबार के हर पन्ने में शायद कमियां ही ढूंढ पाता।
प्रायः उसकी सोच और निष्कर्ष एकतरफा ही होते हैं,
दिशा सूचक की मानिंद, जो बहुत कम बदल पाते हैं।
खुद को ज्ञानी समझकर वो करता है अक्सर बड़ाई,
भले ही आँखों में उसकी ईर्ष्या की चमक पड़े दिखाई।
अपने संगी-साथियों से वाद-विवाद करता, झगड़ता है,
फिर दूसरों के उधार के उजाले का ताज खुद पहनता है।
और उसकी इन हंगामाखेज हरकतों के बीच ही कहीं,
संकुचित दिल की एक खामोश हीनता भी छिपी है वहीं।
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