सत्य की ईंटों से, उसने भव्य मंदिर था रचा,
छल-कपट के वेग से, जो सर्वदा रक्षित बचा;
लोग जिसकी निष्ठा को नमन करते हर घड़ी,
पर स्वयं के ही भाग्य से, प्रबल जंग है छिड़ी।
बंधा रहा जो व्यक्ति सदा सत्य की मर्यादा से,
अपराधी सिद्ध हुआ, एक प्रियजन के दुराव से;
तमाम नतमस्तक हैं, जिसके अडिग चरित्र पर,
हारा वह विश्वास, अजीज़ के घर की चौखट पर।
शिखर किस काम का, जहाँ रूह तनहा खड़ी हो,
जहाँ सत्य की हर दलील, खामोशियों से छोटी हो;
हज़ारों की भीड़ में, वो एक भरोसे का सूरज सही,
खुद की प्रीत की नज़र में, वो अब कुछ भी नहीं।
231 total views, 90 views today
No Comments
Leave a comment Cancel