
न मुझे कोई आभास है, अब कोई सरोकार भी नहीं,
ये शब्द तुम तक पहुँचें या खो जाएँ हवाओं में कहीं;
सत्य एक शिलाखंड है – एकाकी, खुरदरा और निर्भ्रांत,
जिस दिन तुम्हें खोया, मेरी दुनिया पर छा गई थी रात।
लोग मुझे अक्सर कहते हैं, कि पाषाण सा अडिग हूँ मैं
किसे ज्ञात है, अपनी ही पीड़ा की अग्नि में प्रखर हूँ मैं?
एक रिक्त सामर्थ्य है, एक ध्वस्त मनुष्य का कवच मात्र,
तुम्हारी उस क्षति से बड़ा, क्या होगा व्यथा का अन्य पात्र!
न तो वैभव की अभिलाषा, न ही मान-प्रतिष्ठा की प्यास है,
स्पष्ट स्वीकारोक्ति मेरी, जय-पराजय का स्वाद एक समान है;
यह नश्वर जीवन; पश्चाताप और प्रायश्चित की एक यंत्रणा है,
विवश स्वयं को श्रम में डुबोना, बस यही संताप-साधना है।
एक जीवन ठोस धरातल पर, समृद्ध किंतु भीतर से मृत है,
झंझावात से तो बच निकला, पर अब छिपना भी दुष्कर है;
महत्वाकांक्षा की ललक और जीवन का हर्ष, भस्म हो चुके हैं,
न प्रशंसा मन को उद्वेलित करती, न कोई प्रलोभन भाते हैं।
हाँ, शायद ‘बलवान’ हूँ जो उस बोझ को बस सह लेता हूँ,
जहाँ तुम समीप नहीं, उस संसार में अब मौन जी लेता हूँ;
किंतु निस्तब्धता में, तुम्हारी स्मृतियाँ स्वतः उभर आती हैं,
वह प्रेम, वह लालसा, वह वेदना; जिससे मन मुक्ति चाहता है।
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