
दिव्य आभा मानिंद है, यह सृष्टि का सुन्दर रूप
यह दर्पण भी है, मानव की विवेकानुभूति अनूप
घड़ी के बारह बजे, खुलते कितने ही पृष्ठ सफेद
मानों क्षितिज पर हैं भविष्य की गाथा रचते छन्द.
पुराना वर्ष थम गया, आधी रात के कोलाहल में
नये का आगमन हुआ, प्रकाश की प्रथम पुंज में
दिनों की एक कोमल डोर, बीते समय की चमक
जो बीत गया छोड़ो, वक्त दे रहा अब नये सबक.
जब इक नया सवेरा आता है, सूरज के प्रकाश से
नववर्ष आगे बढ़ता है, इक नई ऊर्जा के संचार से
कई नूतन सपने फिर से गढ़ने खातिर, लेते हैं प्रण
एक कैनवस पर उकेरे आशाएं, जीवन का दर्पण.
फिर नई शुरुआत कर लेंगे, साहसिक अंदाज में
न रहें कल के दर्द, कोई गम और ग्लानि साथ में
नये आगाज हों, जग प्रकाशमान हो रोशनियों से
दिन हों रोशन रातें हों जगमग, भरपूर खुशियों से.
Image source: Social Media
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