
अब यह न तो अनुराग की आसक्ति है,
न ही स्मृतियों को संजोए रखने की याचना,
यह तो मात्र अनंत शून्य के पार तैरती हुई…
एक निःशब्द, मूक मनोकामना है—
सीमाओं के भूगोल में घिरी, एक
अदृश्य, निश्छल चेतना का स्पंदन मात्र,
जो समाज अथवा नैतिकता के दायरों,
सीमाओं या मर्यादाओं को स्वीकार कर भी
दिशाहीन गगन में पंख फैलाती है.
कारण..!
वर्षों पूर्व काल के डिजिटल पटल पर
उत्प्लावित आभासी संकेतों के बीच…
किसी अनजाने अंदेशे के कोहरे में लिपटी
कुछ सूक्ष्म रेखाएँ परिलक्षित हुई थीं—
मानो एक अनकहा सत्य उभरा हो:
“कुछ तो ठीक नहीं…”
यह मेरे लिए अस्वीकार्य था, असह्य था.
बुद्धि ने कहा—यह महज़ मृग-मरीचिका है,
अंतर्मन से आवाज़ आई—यही सत्य है.
तत्पश्चात, मेरी जो प्रतिक्रिया रही,
बिना किसी संशय की गुंजाइश के,
वह कोई सांसारिक तृष्णा नहीं थी,
न ही किसी स्वार्थ का मलिन स्पर्श,
यह तो मात्र किसी बेहद खास के लिए
एक स्वाभाविक अंतश्चिंन्तन या तड़प थी.
इसी अंतर्द्वंद्व में उपजा…
एक मौन सा गहरा विषाद,
हृदय में एक अतल, अटल परवाह,
जो बिना किसी प्रतिफल की आस के
केवल किसी अपने के अश्रांत कल्याण हेतु…
अदृश्य क्षितिज पर, एक दीये की भांति,
अनवरत टिमटिमाता रहता है.
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