स्वभावत: प्रतिक्रियावादी
तो मैं पहले भी बहुत कम था
समय और रिश्तों के अनुभवों ने
तो जीवनदर्शन ही बदल डाला है
अब जब कोई अनादर करता है
मैं प्रतिक्रिया देने से बचता हूँ
वाद-विवाद तो बिल्कुल ही नहीं
व्यक्ति से मात्र दूरी बना लेता हूँ
बहस से कुछ हासिल नहीं होता
अतिनाटकीयता सृजनात्मक नहीं
बिना दोष माफी मांगना हल नहीं
खुद को छोटा करने जैसी बात है
हर बात का स्पष्टीकरण देना
किसी को बार-बार समझाना
खुद को हर बार छोटा करना
सुसंस्कृत आचरण की आशा करना
बार-बार अनादर की स्थिति में
इस सब से कहीं अच्छा है
खुद की उपस्थिति हटा लेना…
शायद दूरी ही एकमात्र उत्तर है.
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