
भोर हुई, मन दर्पण मानिंद निर्मल और शांत जगा,
रात्रि की पूरी निद्रा से, हर कोना हर्षित व नया लगा;
पर इस पावन सन्नाटे में, एकाएक ऐसी टीस उठी,
एक तीखी कूक से, मानो जैसे अंतर्मन की शांति लुटी।
देखा एक पपीहा अपनी विरह-वेदना फिर दोहराता है,
जैसे एक सुलगता, अनसुलझा गीत नभ में बिखराता है;
“पी कहाँ… पी कहाँ…” की गूँज गगन को चीर रही,
मानो वह अपनी खोई प्रियतम को अब तक ढूँढ रही।
बचपन में सुनी, माँ की वह दंतकथा अब याद आती है,
बिरही राजकुमार की व्यथा, जैसे पंख बन फड़फड़ाती है;
जन्म-जनम की यह खोज, मानो इस स्वर में समाई है,
विह्वल हृदय ने बस यही एक पुकार सदा से पाई है।
उसी एक स्वर में, उसकी भी सारी दुनिया सिमट गई,
विरह और प्रेम की डोर से, यह ज़िंदगी भी लिपट गई।
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