
विस्तृत, गहन अरण्य, चित्तीदार शिकारी दबे पाँव चलते हैं
जुड़ाव उनके रक्त से नहीं, लोभ की दमघोंटू गंध से बंधे हैं
पीली आँखों में धधकती भूख, जबड़ों में छिपा विश्वासघात
जंगल के स्वर्ण-हृदय सम्राट पर धोखे से घात लगाते हैं।
अकेला एक लोलुप, वन सम्राट की चाल नहीं तोड़ सकता
पर क्रूर, उन्मादी समूह से बच निकलने का भी नहीं रास्ता
वहशी एड़ियों पर काटते हैं, ठंडे इरादे से धैर्य को चीरते हैं
जब तक कि देह क्या साँस भी थककर चूर-चूर न हो जाए।
एक सभ्य सत्पुरुष ऐसे ही दुर्जनों की चुगली-चर्चा में फंसता है
जहाँ छिपे हाथ, खोखले दिल उसे गिराने की साजिश रचते हैं
एक ईमानदार आघात से नहीं, बल्कि हजारों दिलकश झूठ से
स्वार्थी हितों का झुंड, सुंदर आवरणों के नीचे शिकार करता है।
विश्वासघात की मंथर चक्की, उसकी गरिमा तार-तार करते हैं
संकीर्णता की कड़वाहट लड़ती है अपनी ओछी और क्षुद्र लड़ाई
और अंततः
एक उदात्त हृदय, द्वेष और स्वार्थ से निचुड़कर मोर्चे से हट जाता है
तब भूखी परछाइयाँ उत्सव मनाती हैं सामूहिक भोज करती हैं।
158 total views, 158 views today
No Comments
Leave a comment Cancel