My Humming Word

Poem

  1. Poem
संपादक की पसंद तितली रानी, तितली रानीकरती फिरती हो मनमानीफूल-फूल मंडराती फिरतीपीछे अपनी छोड़ निशानी। खुद के रंगों और चंचलता सेतुम सबका मन हर लेती होऔर अपने छोटे से जीवन सेजीने की कला सिखलाती हो। लेकिन आज उदास इस तरहवीराने में आकर क्यों बैठी होक्या तुम हो बीमार या फिररूठ किसी से, यूँ ही ऐंठी […]
  1. Poem
अपने संस्कारों व अर्जित ज्ञान के बल पर,देश व समाज में खुद का स्थान ही नहीं,अपितु उसने जीवन में कौशल भी सीखा;अपने प्रियजनों, रिश्तों और संबंधों को,जीवन भर के लिए, एक ईमानदारी सेसंभालना, सहेजना और पोषित करना।  परन्तु वह आजतक नहीं समझ पाया,उनको, जो एक गिरगिट की तरह अक्सर,खुद की सुविधा और माहौल के अनुसार,जल्दी-जल्दी […]
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संपादक की पसंद उसने मुझसे कहा दूसरों के लिए जीना अबबहुत हुआ, बहुत हो लियाअब वह केवल खुद के लिएखुद की खुशियों के लिए जीना चाहता है…! फिर शेष जीवनवह इस जुनून के साथ, खुशी की चाहत लिएखुशी की तलाश मेंएक अंधी दौड़ में शामिलएक लम्बी-अंधी सुरंग मेंजिसका न आदि है न अंतचलता रहा, दौड़ता रहा है…दौड़ आज भी […]

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दिव्य आभा मानिंद है, यह सृष्टि का सुन्दर रूपयह दर्पण भी है, मानव की विवेकानुभूति अनूपघड़ी के बारह बजे, खुलते कितने ही पृष्ठ सफेदमानों क्षितिज पर हैं भविष्य की गाथा रचते छन्द. पुराना वर्ष थम गया, आधी रात के कोलाहल मेंनये का आगमन हुआ, प्रकाश की प्रथम पुंज मेंदिनों की एक कोमल डोर, बीते समय […]
कभी-कभार एक छोटी सीनोकझोंक अथवा वाक्कलहजीवन भर के अर्जित स्नेहऔर बेशकीमती दोस्ती-यारानाको भी चोटिल कर जाती है… यदि आप सच में प्यार करते होतो ऐसे में बिना देरी के सक्रिय होकरविश्वास वापस लाने की खुद पहल करें…दोस्त गुब्बारों जैसे ही होते हैंयदि आप कसकर नहीं पकड़तेतो वे कभी भी टूट सकते हैहमेशा के लिए छूट […]

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दिव्य आभा मानिंद है, यह सृष्टि का सुन्दर रूपयह दर्पण भी है, मानव की विवेकानुभूति अनूपघड़ी के बारह बजे, खुलते कितने ही पृष्ठ सफेदमानों क्षितिज पर हैं भविष्य की गाथा रचते छन्द. पुराना वर्ष थम गया, आधी रात के कोलाहल मेंनये का आगमन हुआ, प्रकाश की प्रथम पुंज मेंदिनों की एक कोमल डोर, बीते समय […]

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सूख चुके हैं प्रेमपात्र सब, मदिरा की गागर दे दो भूल चुका हूँ कौन कौन है, विस्मृति का आश्रय दे दो. ईश्वर सबकुछ भूल गया है, कृष्ण नही अब रथ पर हैंसत्य-प्रेम की राहों पर हम, फिर भी काँटे पथ पर हैं. जीवन बंधा-बंधा सा क्यों है, हाहाकार मचा यह क्यों है मानव संबंधों के तलतम  में, यह भूकंपी […]
लाख समझाने पर भी नहीं समझता आईना मेरा अंदर की टूटती नसें भी उकेर दीं बनाकर उसने दरकती लकीरें वो जो बैठे हैं गहरे दिल में मेरे आईना मेरा उन्हें भी हूबहू दिखाता है. कैसे छिपाऊँ दर्दे-दिल को सामने जब बैरी-मितवा हो ऐसा चुप हूँ मैं, चुप हैं वो, मंजर है खामोशी का यह कैसा. दिल की जिद है रग-रग में […]
समय चुप है अपनी निष्ठुरता लिए बदल रहा है निरंतर. तुम समय हो मेरे समय जिसने प्यार दिया अनंत डुबोकर किया एकाकार खुशियों से अमृत सुख की स्मृतियों से साँस साँस में चलती अनवरत सामीप्य की अव्यक्त अनुभूतियों से.     समय मेरा दूर असंबद्ध सा अबदर्शक सा बन बदल रहा है     सहारे तन के मन के     तुझसे जो बंधे थे अडिग अटूट  […]

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